उफ्फ, मेघनाथ मेले कि ये अनोखी परम्परा

उफ्फ, मेघनाथ मेले कि ये अनोखी परम्परा

बैतूल : मध्य प्रदेश के बैतूल के आदिवासी अंचलो में आज भी ऐसी परंपरा है जो जान जोखिम में डालने वाली और हानिकारक है पर समुदाय इन्हें निभाने से जरा भी परहेज नहीं करता। यह परंपरा है होली पर्व पर लगने वाले मेघनाथ मेले में ऊंचे और चिकने खम्बे पर चढ़कर जेरी तोड़ने की। सालों से चली आ रही इस परम्परा को आदिवासी अंचलों के लोग आज भी निभाते चले आ रहे है। बैतूल जिले के ग्रामीण इलाकों में होली के दूसरे दिन से ही पांच जगहों पर मेला लगता है। मेले में 40 फिट ऊंचे खम्बे पर जिसे तेल ग्रीस जैसे चिकने पदार्थों से पोता जाता है, पर युवक कुछ पैसों के लिए अपनी जान की बाजी लगाकर चढ़ता है और जेरी तोड़कर मेले का शुभारंभ करता है।

जिले के आरुल गांव में होली के तीसरे दिन मेला लगता है इस मेले में आदिवासी लोग आते है और मेघनाथ की पूजा करते है। लोगों का कहना है कि यह मेला सैकड़ो वर्षो से लगता आ रहा है। इस मेले में जेरी का खम्बा होता है जिस पर बंधे कुछ पैसों की खातिर युवक जान की बाजी लगाकर ऊपर चढ़ते है। खास बात यह है कि इस खम्बे को चिकना करने के लिए इस पर तेल ग्रीस पोता जाता है। हिम्मतवाला युवक ही रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ पाता है जहां जरा सी चूक से युवक की जान जा सकती है। जेरी तोड़ने वाले युवक कपिल उइके का कहना है कि इस जोखिम भरे काम को करने पर उन्हें कोई पैसे नहीं मिलते मगर जो जिगर वाला होगा वही इस काम को करता है,बस इसलिए वह दिलेरी के साथ जेरी पर चढ़ता है। परम्परा की खातिर इस मेले में आदिवासी लोग यहां आते है और अपनी मन्नत पूरी होने पर पूजा पाठ करते है। इस पूरे मेले में पुलिस प्रशासन भी मूक दर्शक बन अपनी ड्यूटी पूरी करता है। ज़ाहिर है आज के आधुनिक युग मे इस तरह के जोखिम भरे कृत्य लोगों में जागरूकता के आभाव की ओर इशारा करते है। पुलिस अधिकारी इसे परम्परा का हवाला देकर जागरूकता की बात कर रहे है। कपिल उइके (जैरी पर चढ़ने वाला युवक)  का कहना है कि इस जोखिम भरे काम को करने पर उन्हें कोई पैसे नही मिलते मगर जो जिगर वाला होगा वही इस काम को करता है,बस इसलिए वह दिलेरी के साथ जेरी पर चढ़ता है। बबलू सोनी (स्थानीय ग्रामीण) का कहना है कि बैतूल जिले में ऐसे मेलो की शुरूआत आरुल गांव से हुई थी इसे मेघनाद मेला बोला जाता है,लकड़ी के खम्बे को जैरी बोलते है इस आयल और ग्रीस लगाया कर बहुत चिकना किया जाता है। आनंद राय (एसडीओपी बैतूल) का कहना है कि ये परम्परा बहुत सालो से चली आ रही है जिसमे एक व्यक्ति जैरी पर चढ़ता है इसको लेकर जागरूकता चलाई जा रही है।

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