आदिवासियों का प्रणय पर्व,देखिये इस विशेष पर्व की झलक

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मध्यप्रदेश : आँखों मे काला चश्मा  ... 
हाथ में बांसुरी ...
चटक रंग वाले कपड़ो से लक़दक़  ....
ढ़ोल - मांद्ल की थाप पर ....
नाचते झूमते आदिवासी युवा ....
तो वहाँ रंग बिरंगे पारंपरिक परिधानों से सजी  ...चांदी के भारी भारी गहनों से लदी शोख़ी बिखरेती नवयोवनाये जब ढ़ोल एवं मांद्ल की थाप पर थिरकते हैं तो पूरा माहौल ...मस्ती में सरोबार हो जाता है | ऐसा लगता है कि मानो पूरे वातावरण में प्रेम का नशा घुल गया हो | 
यह नज़ारा है ...मप्र के झाबुआ - अलीराजपुर मे होली से  पहले मनाये जाने वाले प्रणय पर्व का ...| जिसे आम तौर पर भगोरिया पर्व भी कहा जाता है | 
बसंत ऋतु ...
चारों और पलाश के फूलों की लाली ...
माहौल में घुलती महुआ - ताड़ी की मादकता...
खेतों में इतराती फसलें ....
जब ऐसा मन मोहने वाला मौसम हो तो भला यह दिल कहाँ  काबू रहने वाला है | युवा आदिवासी बांसुरी पर तान छेड्ता है और पूरा समा ...ढ़ोल मांद्ल की थाप पर झूमने लगते हैं | ठीक होली के  8 दिन पहले से  शुरू होने वाला ये  पर्व  पूरे 21 दिन तक चलता है | आदिवासी इस दौरान बड़े धूम धाम से होली,रंगपंचमी,सीतला सप्तमी,दशामाता और गढ़ के त्योहार मनाते है | युवाओं के बीच होने वाली हंसी ठिठोली ,घुंघरुओं की झनकार  हर आम व खास को अपनी ओर आकर्षित करती है | 
इस प्रणय पर्व पर नाचता गाता आदिवासी युवा अपनी प्रेयसी का पास पहुँच कहता है कि ...''चाल थने बैलगाड़ी में बेठाणी ने भगौरिया भालवा ले चालूँ ...|
यानि कि चल तुझे बैलगाड़ी में बैठाकर भगौरिया देखने ले चलता हूँ | 
कहा जाता है कि आदिवासी युवक - युवती इस मेले में मिलते है | दिल से दिल मिलते हैं और फिर युवक ,युवती को भगाकर अपने साथ ले जाता है और फिर दोनों की शादी हो जाती है | कहा तो भी जाता है कि प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे के कपड़ों पर पान की पीक थूक कर अपने  प्रेम का इजहार करते हैं | 
हालांकि समय के साथ इस त्योहार में भी काफी बदलाब  आया है | युवक युवती अब पारंपरिक वेश भूषा से इतर अब पेंट,शर्ट,जींस,टीशर्ट में ज्यादा दिखतें हैं | पारंपरिक वाद्य यंत्रो  का स्थान पर नये जमाने का डीजे लेता जा रहा है | पैर..अब लोक संगीत पर नहीं बल्कि फिल्मी गानो पर थिरकते हैं | भगौरिया की मस्ती देखने के लिये न सिर्फ भारत के कोने कोने से देखने आते हैं बल्कि विदेशीयों के लिये भी यह आकर्षण का केंद्र होता है | 
भगौरिया का यह पर्व झाबुआ - अलीराजपुर, धार,बड्बानी,के साथ साथ गुजरात के दाहोद,छोटा उदयपुर एवं कावाट क्षेत्रों में भी जोर शोर से मनाया जाता है | 
समय ज़रूर बदला लेकिन आज भी परम्पराओं की लड़ियों में गुथा यह पर्व आदिवासी समुदाय की समृद्ध संस्कृति का बेहतर उदाहरण पेश करता है |

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