कहाँ उलझी ? कमलनाथ सरकार

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<15 साल  से खिसकते घिसटते चंद महीने पहले ही कांग्रेस सरकार ने आकार लिया | शिव से ज्यादा शिकायत तो न थी लेकिन बदलाव की आवश्यकता थी | कर्ज़ माफी का झुनझुना भी खूब आवाज़ कर रहा था | ज़ाहिर है कि नयी सरकार से आम मतदाता को बड़ी आशा थी | 
लेकिन उफ़्फ़ सत्ता में ठसतें ही आशा की हवा निकलने लगी | यहाँ मोदी को कोस कोस कर और मजबूत कर दिया | परिणाम फोड़ने निकले  | हालात इतने बिगड़े कि राजा साहब से लेकर महाराजा साहब तक सब नप गए | खुद मुख्यमंत्री और ओ उनके पुत्र भी जैसे तैसे जीते |
सवाल बड़ा कि वाकई ये मोदी की सुनामी थी या फिर कमलनाथ सरकार की असफलता | तर्क दिया जा सकता है कि पूरे देश में जो माहौल था  ...वैसा ही कुछ मप्र मे हो सकता है | 
नहीं  ... बिलकुल नहीं | सिंधिया का हारना चौंकाता है तो अन्य भाजपा उम्मीदवारों का लाखों की वोट संख्या से जीतना सवाल खड़ा करता है | भाजपा के नंदकुमार सिंह चौहान,बी.डी.शर्मा,वीरेंद्र खटीक,सुधीर गुप्ता,रोडमल नागर जैसे कई उम्मीदवार थे जिनके जीतने की आशा बहुत ज्यादा न थी | 
लेकिन फिर भी मप्र में क्लीन स्वीप ...| कांग्रेस को बड़ा डेंट तो कर्ज़ माफी के वादे को ठीक से पूरा न कर पाने से हुआ है | सरकार पर आते ही तबादला उद्योग शुरू होने का आरोप लग गया | चुनाव के दौरान मंत्रिमंडल अपने ही क्षेत्रों में औपचारिक मुंह दिखाई करता रहा | हाल ये कि सारे मंत्री मिलकर कुछ न कर पाये | आम जन के सामने सरकार की विश्वसनीय तस्वीर न गढ़ पाई | 
इसमें में भी कोई शक नहीं कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के पास भरोसे मंद चेहरे का अभाव था | कई और बड़ी वजह हो सकती हैं हार की लेकिन चंद महीने पहले आप वापीसी करते हैं और फिर टाँय टाँय फिस्स हो जाते है तो बेशक ज़िम्मेदारी कांग्रेस के मुखिया की बन ही जाती है  |
देखिये अब क्या होता है | कितने मंत्रियों पर गाज़ गिरती है | काम काज में क्या बदलाव होता है | और सबसे बड़ी बात दिग्विजय,सिंधिया,अजयसिंह,भूरिया और अरुण यादव जैसे हारे नेता ...अपनी खुन्नस कैसे निकालते हैं |

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