कुर्सी बचाते कमलनाथ

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<कांग्रेस ने सोचा भी न होगा कि  मोशा उनके आंगन में आकर ऐसी झाड़ू लगा जाएंगे कि सारे लक्ष्य और अरमान निराशा के ढेर पर पड़े अंतिम सांस गिन  रहे होंगे । 
वाकई गजब ही था । कम से ऐसी आशा न थी और फिर ..मप्र से तो कतई नही  । चंद महीने पहले ही इस प्रदेश के मतदाताओं ने शिवराज जैसे धाकड़ नेता की सरकार को खारिज़ कर आगे की जिम्मेदारी कांग्रेस को सौंपी थी । 
यह वाकई में कांग्रेस की जीत नही थी बल्कि शिवराज सरकार से लोग ऊब चुके थे । विकल्प के तौर पर मात्र पंजा ही था...तो बिल्ली के भाग्य से छींका फूट गया । वक्त बदल गया । 
इधर छींका फूटा तो बिल्ली अपने पुराने वादे भूलकर मक्खन खाने में जुट गयी । 
परिणाम ये हुआ कि राजा साहब से लेकर महाराजा साहब तक को मतदाताओं ने घर की शोभा बना दिया । 
हार की जिम्मेदारी बनती है । कमलनाथ प्रदेश अध्यक्ष के साथ साथ सरकार के मुखिया भी हैं । ज़ाहिर है कि उनकी बड़ी जिम्मेदारी सीधे सीधे बनती है लेकिन कमलनाथ पर लगता है कि सत्ता का मोह कुछ ज्यादा हावी है । आश्चर्य है कि दिल्ली में होने वाली CWC यानी कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी की समीक्षा बैठक में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से पीछे हट गए । 
खबर खूब थी कि चुनावी मोर्च पर असफल हुए जिम्मेदार नेता अपने अपने पद से इस्तीफा देकर नये लोगों को मौका देंगे । 
कमलनाथ समझते है कि इस बार जो हार मप्र में हुयी है उसमें मोदी अंडरकरंट के साथ साथ उनकी सरकार की प्राम्भिक तौर पर सीधी सीधी असफलता है । कर्ज़ माफी का वादा पूरा न होना,तबादला उद्योग,फिर से उभरती गुटबाजी,सरकार में लोगों का विश्वास न बना पाना जैसे बिंदुओं ने लोकसभा की 29 में से 28 सीटों को भाजपा के हवाले कर दिया । 
कमलनाथ प्रदेश अध्यक्ष के पद को छोड़ने कों सहर्ष तैयार होंगे लेकिन काफी जद्दोजहद के बाद आई मुख्यमंत्री की कुर्सी को यूं ही नही जाने देंगे | 
ज़ाहिर है कि cwc बैठक में दबाब बनता । दिग्गी,सिंधिया, अरुण यादव ,अजय सिंह जी जैसे नेता भी हार के बाद कमलनाथ से खार खाये बैठे हैं । 
साफ है कि बिगड़े समीकरणों के बीच कमल बाबु बजाय कांग्रेस पार्टी की दरारों को ठीक करने के ...उफ़्फ़ ,अपनी सरकार को बचाए रखने की जुगत में अधिक गंभीरता दिखा रहें है । 
अब भले ही कमल बाबू दिल्ली से दूरी बना ले लेकिन सारे घमसानों के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी को कब तक बचाये रखते हैं...ये देखना वाकई दिलचस्प होगा ।\

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