बढ़ती महंगाई का असर ! उफ्फ..मोदी की योजना भी बिकी कबाड़ में


पीएम मोदी बाबू (PM Modi) की फ्लैगशिप योजना (Falegship Scheme) उफ्फ़ (uff)..अब कबाड़ की दुकान पर बिक चुकी है।
यह क्या आपके चेहरे पर सवाल नाचने लगे!
सही है.. भला योजना की लंका लगते तो सुना है... कबाड़ में बिकना.. हद है?
लेकिन सच है साहब
सौ टका सच..
अब आंख चौड़ी हों या दिमाग फटे।
दिल दुखे या भरोसा घटे।
जो भी हो ...स्थितियों की अर्थी पर सवार होकर योजना तो कबाड़ की दुकान पर जा टिकी है| 

जिसका गाना गा गा कर खूब तालियां बटोरी?

जिसके चलते विश्व स्तर तक डंका बजा।

   बेशक मोदी बाबू की योजना एक दम चोखी थी लेकिन उफ्फ़.. सरकार के ही एक कदम ने शानदार योजना को कबाड़ तक पहुंचा दिया।

(उपर टँगा वीडियो देखिए)

सुना आपने.. मोदी बाबू क्या बोले । जी उज्ज्वला योजना ने आकार लिया वहां केंद्र सरकार की वाहवाही होने लगी। लेकिन चंद महीने, और योजना कबाड़ बनकर यहां गिर पड़ी।

(देखिए वीडियो)

जी..कबाड़ी वाले भैया की दुकान है और यह गैस सिलेंडर ही हैं। वो गैस सिलेंडर जो मोदी बाबू ने छाती ठोंककर उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त दिए थे। लेकिन बड़ा सवाल. जब गैस कनेक्शन मुफ्त मिल गया तो यहां क्यों?

सुन लीजिए, सब समझ आ जाएगा ।

(देखिए वीडियो)

जी..साहब उज्ज्वला योजना की घोषणा से मानो ज़रूरतमंद ग्रामीण महिलाओं की खुशी तो सातवें आसमान पर थी। लेकिन उफ्फ़..यह खुशियां चंद महीनों में ही घिसट कर बिखर गई। महंगाई ने ऐसा डंक मारा कि योजना कबाड़ तक पहुंच गई।
    मप्र का भिंड जिला। योजना के तहत एक लाख पचास हज़ार कनेक्शन का लाभ ज़रूरतमंदों को मिला। एक बार तो उपयोग किया लेकिन पचास फीसदी ऐसे लोग हैं जो फिर से सिलेंडर रीफिलिंग करवाने का बूता ही नही रखते।
अब गैस शो पीस है और जिंदगी वापिस धुएंदार चूल्हे पर।

 (देखिए वीडियो)

ठीक भी है साहब..सिलेंडर 925 से लेकर 1050 रुपये के आसपास घूम रहा है। जहां दो वक्त का राशन के लिए जद्दोजहद हो वहां, यह बड़ा खर्चा...उफ्फ़
अब क्या करें जब खर्चा बूते से बाहर तो कबाड़ में बेचकर ही कुछ मामला जमा लो ।
  मामला उठा तो जिम्मेदार हरकत में आए । सिलेंडर के दाम तो घटा नही सकते लेकिन जांच करके उन सब लाभर्थियों पर गाज ज़रूर गिराएंगे जिन्होंने सिलेंडर कबाड़ में बेच डाला । सरकारी संपत्ति जो था।
इसे कहतें हैं उंगली थामकर एक कदम आगे बढ़ाना और धक्का देकर चार कदम पीछे छोड़ देना ।
मोदी बाबू तालियों के आवाज के पीछे, ज़रा महंगाई से कराहने का दर्द भी सुन लीजिए । वरना आज तो योजना कबाड़ तक पहुंची हैं आगे कहीं उफ्फ़.. इंसानी जिंदगी ही कबाड़ न हो जाए