खर्च ऐसा कि फ़िजूल खर्च भी शर्मा जाए। आम आदमी के जख्मों पर उफ्फ़.. नमक छिड़कता, सरकारी इवेंट


घर के बाहर खड़े मगलू की आँखे  .. पेंडुलम की तरह से यहाँ से वहां मटक रही थीं|

बुढ़ाती आँखों में नज़ारों के साथ आश्चर्य भी कैद हो रहा था| 

है भगवान  ... करोडो रूपये? 

मुंह से निकले शब्दों में हैरत फैले पड़ी थी| 

आँखों ने कैद की शहर की तस्वीरों को, दिल को दिखाया तो मानों उसे भरोसा ही न हुआ ? 

बोल पड़ा 

यह कैसे ? सम्भव ही नहीं | 

यहाँ दिमाग भी चौंका  .... 

अरे, अभी गुज़रे साल भी तो न हुआ | जब कोरोना राक्षस ने कमली को लील लिया | 

दस साल जीवन के साथ गुज़ारे | आठ साल की तो,  मुन्नी ही हो गई अब | 

चंद  महीने पहले अचानक बुखार ने तोड़ा तो डॉक्टर साहब को दिखाया | तबियत और बिगड़ी तो अस्पताल में दाखिल कराने को कहा गया | हमीदिया से लेकर सभी सरकारी अस्पताल को छान मारा | बिस्तर न होने का हवाला देकर हकाल सा  दिया गया | 

निजी अस्पताल पहुंचा तो खर्चे ने जान हलक तक ला दी | 

क्या करता ? पत्नी की जान से ज्यादा तो कुछ नहीं | 

आशा थी कि बिस्तर न मिला तो क्या हुआ? सरकार तो गरीबों की ही है | आर्थिक मदद तो मिल ही जाएगी | 

भाषणों में खूब सुना था | 

खैर सुनने और होने में एक बड़ा अंतर् होता है,साहब | समझ भी आ गया | 

दफ्तरों की खाक और अफसरों की झाड़ के बीच सिर्फ एक ही जबाव  ... 'कुछ नहीं कर सकते, सरकारी खजाना खाली है'

नेता जी तो मिले तक नहीं  ... | 

जमापूंजी,  यहाँ तक कि  घर भी किसी और का हो गया लेकिन,  इलाज नाम की 'सुरसा का पेट' न भरा | 

हाथ खाली हुए तो साथ भी छूट गया | 

कमली अपना वादा तोड़ ,मुन्नी को अकेला छोड़ हमेशा हमेशा इस दुनिया को राम राम कह गयी | 

पूरा पैसा तो इलाज चूस गया | क़र्ज़ की फेहरिस्त में अब अंतिम संस्कार का खर्चा भी शामिल था|  

कड़वी यादों के गलियारे से भटक वर्तमान में आया तो झटका सा लगा | 

आज अचानक सरकार के ख़ज़ाने में करोडो कहाँ से आ गए ?

ऐसा शाही खर्च कि उफ्फ .. फ़िजूल खर्च भी शर्मा जाए !

अजब है ... सिर्फ चार घंटे ... सिर्फ चार ही ही घंटे !!

कैसे, सैकड़ों जान से अधिक महत्वपूर्ण  साबित हुए  ? 

'सहसा ..क्या सोच रहे हो पापा' .... मुन्नी की आवाज ने मंगलू का ध्यान तोडा | 

आँखे पोछ बोला  ... 'कुछ नहीं ...खेलकर आ गई'

कहाँ पापा  ... आज तो बाहर पुलिस ही पुलिस हैं | बहुत भीड़ भी है |  पता है आज सरकार अंकल आ रहे हैं तभी तो मेला लगा है ... 

चहकती हुई से मुन्नी बोली | 

'अच्छा पापा, यह सरकार अंकल कौन हैं ?

मंगलू मुन्नी के सवाल से थोड़ा अकबका सा गया | क्या बताए , क्या होते हैं सरकार अंकल | 

मुन्नी ने जिद पकड़ी तो मंगलू ने दांत पीसते हुए कहा ... 'वही, जिन्हे बनाते हम हैं और वो खुदा हो जाते हैं !

आसमान की तरफ देखते हुए मंगलू बड़बड़ाया  ... 'वोट हमारा,ख़ज़ाने में टेक्स से वसूला गया धन हमारा लेकिन विडंबना  .. ताकत,अधिकार,ऐशो आराम उनका | 

वाह  रे लोकतंत्र  ! 

मंगलू की आँखे अब मुन्नी पर गड़ी थी | आँखों में गुस्सा उबल रहा था | मुट्ठियां भिंची थी | 

' जो हम जैसे बेबस,लाचार लोगो का खून चूस कर आकार ले ,वो होती है सरकार !!

मुन्नी को समझ ही नहीं आया कि  पापा क्या,क्यों और किसके लिए कह रहें हैं| 

सही भी हैं  .... अभी उसने दुनिया कहाँ देखी थी | 

पापा का हाथ छुड़ाकर मुन्नी बोली ... अच्छा छोडो  ... मुझे नहीं जानना सरकार वरकार अंकल के बारे में  .... मै तो चली बाहर .. मेला देखने  ..... | 

मुन्नी के क़दमों ने बाहर का रुख कर लिया लेकिन मंगलू उफ्फ  ...गुस्से से जूझता हुआ मज़बूरी के साथ सोच का हाथ थामे  .... पास पड़ी कुर्सी पे फिर पसर गया |