मप्र के तंत्र को टटोलना चाहते हैं तो? यह देख लीजिए सब समझ आ जाएगा


मप्र के सरकारी तंत्र में क्या और कैसा चल रहा है?
जानना चाहते हैं तो छतरपुर की घटना काफी है।
सत्ताधारी दल के विधायक ने अपना दम दिखाया तो कलेक्टर साहब ने कलेक्टरी।
यानी कि आपसी नूराकुश्ती के पीछे अहम और स्वार्थ था। जिसने चरमराते तंत्र की पोल खोल कर रख दी।
मसला छतरपुर जिले से जुड़ा है।
चंदेला से भाजपा विधायक राजेश प्रजापति अपना काम लेकर कलेक्टर शीलेन्द्र सिंह के दफ्तर पहुंचे। कलेक्टर साहब ने इंतज़ार करने को कहा लेकिन कुछ देर बाद बिना मिले ऑफिस से निकल  लिए ।
मरते क्या न करते झेंपते हुए से विधायक कलेक्टर साहब के सरकारी बंगले पर जा पहुंचे।
यहां भी कचरा हो गई।
संतरी ने साहब का न होने का हवाला देते हुए रवानगी डालने का इशारा कर दिया।
तभी अंदर से निकले अफ़सर ने विधायक जी के जख्मों पर नमक छिड़कते हुए बता दिया कि...साहब तो बंगले में ही पसरे हैं।

बस फिर क्या था? विधायक जी का पारा आसमान छू गया और वही धरने पर जम लिए।

परेशान विधायक जी ने कैमरों के साए में प्रदेश अध्यक्ष से लेकर संगठन के अन्य पदाधिकारियों को अपना दुखड़ा भी सुना मारा।

खबरें चली और सियासी दबाव बढ़ा लेकिन साहब थे जो बाहर न निकले।

ठीक चार घण्टे बाद ...लगभग रात 11 बजे ..कलेक्टर साहब अपना अलहदा अंदाज पकड़े घर से निकले।
एकदम चिढ़ाने वाली मुस्कान के साथ विधायक जी का हाथ जोड़कर स्वागत किया और सीधे मिलने की वजह पूछ मारी।

नेता जी को लगा होगा कि अकेले में मुलाकात होगी लेकिन उफ्फ़..मीडिया और समर्थकों के जमावड़े के बीच  विधायक जी असमंजस में पड़ गए।

कलेक्टर साहब मांग पूछते रहे और नेता जी टालते रहे।

साफ है कि नेता जी कोई खास निजी काम को लेकर कलेक्टर से मिलना चाहते थे, जिसे लोगों के बीच पूछ कर कलेक्टर साहब ने रायता फैला दिया।
खैर..साहब पूछते रहे..विधायक जी मामले को गोल गोल करते रहे।

आखिरकार मांग लिखित में देने का कहकर साहब बंगले के अंदर हो लिए ।

वहां अकबकाए नेता जी ने फिर से तानाशाही का आरोप, साहब पर जड़ मारा।

दरअसल कलेक्टर साहब काफी सख्त अफ़सर माने जाते हैं। सीधे मुख्यमंत्री की डोर थामे साहब..जनप्रतिनिधियों के काम तो छोड़िए, उन्हें सीधी घास भी नही डालते। जिसके चलते नेताओं में मायूसी के साथ काफी नाराज़गी है।

यहां विधायक जी उस क्षेत्र से आते हैं, जहां रेत कारोबार  के खूब चर्चें हैं।

सुना है नेता जी, किसी काम के लिए कुछ लेनदेन कर चुके थे लेकिन साहब ने अड़ंगा डाल दिया।

बीच में फंसे नेता जी यह काम तुरंत चाहते थे और दबी नस देखकर साहब ने अपनी कलेक्टरी दिखा दी।
कौन गलत, कौन सही...? यह तो भैया ऊपर वाला जाने। लेकिन अहम और स्वार्थ के चलते उफ्फ़.. तंत्र की ज़रूर लँका लग रही है । भुगतना मजबूर जनता को पड़ेगा।