आदिवासियों पर भारी पड़ती । उफ्फ़..नेताओं की नौटंकी


तंगलू सुबह से ही कोना पकड़े बैठा था। अचानक आंख मिचमिचाते हुए पास बैठी पत्नी से फुसफुसा कर पूछा ।
"क्यों ..हम लोग क्या आदिवासी हैं?"
काम में लगी पत्नी के हाथ वहीं के वहीं थम गए।
देख ज़रा...जै देख?
  भगवान कसम मामा और छोटे चाचा ने ऐसा रंग पकड़ा कि उफ्फ़...आदिवासी खुद ही चकरा गए कि..असल कौन?
  मप्र की सियासत में आदिवासी मुद्दे का तड़का ऐसा लगा है कि.. खुद आदिवासी भी असमंजस में हैं ।
 'अच्छे दिन का तो पता नही लेकिन समाज के नाम पर खूब चरचर्राटा है।
सभी सियासी दल इस वोट बैंक को देखकर जीभ लपलपा रहे हैं।
भाजपा ने करोड़ो बहाकर एकदम माहौल खींच दिया। ऐसा लगा कि...आदिवासियों का खैरख्वाह है तो सिर्फ..यही पार्टी।
  यहां कमल बाबू तो ट्विटर पर ही अटके रहे...बेटे नकुल नाथ ज़रूर हाथ में ढोल थामे..आदिवासियों को रिझाने के लिए नाचने लगें।
  यह अच्छा है साहब... आओ, बाजा बजाओ,नाचो गाओ, विकास के वादे का झुनझुना पकड़ाओ,वोट हासिल करो और पतली गली से निकल लो।
  ख़ैर अब मामा, छोटे चाचा के हाथ लगता है..उसके लिए तो इंतज़ार..। लेकिन कम से कम इस बहाने हाशिए पर जा टिके आदिवासियों की पूछ परख ज़रूर बढ़ गई है....