महाराजा साहब, अब क्या रुलाओगे 👁️


वहां थे, तो सत्ता पर झाड़ू लगवा दी।
 यहां पहुंचे तो उफ्फ़.. लगानी पड़ गयी।
झाड़ू तो साथ रही बस...क्रिया, का फर्क पड़ गया।
केंद्रीय मंत्री महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया।
किस्मत का खेल देखिए,कुर्सी का मोल देखिए।

   कॉंग्रेस में थे। मसला न जमा तो खेल हुआ, परिणाम सत्ता की झाड़ू ही लगवा दी।
जब दल बदला, कुर्सी मिली लेकिन मंत्रालय का माल बिक गया ।

अब क्या करें...हाथ में फिर झाड़ू।
वैसे तस्वीरें किसी मजबूरी की नही हैं लेकिन साहब नम्बर बढाने के लिए ज़रूर हैं।
एक वक्त था, जब राज के लिए पूर्वजों के हाथों में तलवार हुआ करती थी। वक्त यह भी, कुर्सी की चाहत के लिए अब हाथ में झाड़ू है।
अरमान बाकी हैं, लक्ष्य अधूरा है। चलिए एक पद तो मिला..चाहत तो दूसरे की थी ।
मौका गुजरा नही है। लेकिन आसान भी नही..।
दिखास,मनास कर्म तो करना होगा...तो उफ्फ़...झाड़ू लगाना ही सही।