भोपाल में सिर्फ एक जगह लहराया तिरंगा और वो भी शर्तों के साथ ?


पूरा देश आज़ादी की सांस ले रहा था तब देश के दिल भोपाल की सांसे जकड़ी थी | देश में आज़ादी की ख़ुशी में घर घर झंडा फहराया गया | मिठाइयां बांटी गई | लेकिन भोपाल में खुशियों का इज़हार तो छोड़िए सिर्फ एक ही जगह तिरंगा लहरा सका,और वो भी शर्तों के साथ | 
 
 
क्यों नहीं थी तिरंगा फहराने की इज़ाज़त 

देश भले ही गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ चुका था | शहीदों को उनके मकसद में सफलता मिली थी | लेकिन भोपाल की जुदा कहानी थी | तालों की नगरी नवाब साहब की रियासत थी,और हुजूर नहीं चाहते थे कि यह भाग आज़ाद भारत का हिस्सा बने | दबाव था लेकिन नवाब हमीदुल्ला खां का स्वार्थ मानने को तैयार न था | यही एक बड़ी वजह रही कि भोपाल की सरजमीं पर तिरंगे को फहराने की इज़ाज़त नहीं थी | बहुत से लोग चाहते थे कि तिरंगे की शान यहाँ भी बिखरे लेकिन रियासत के आदेश के आगे सब मज़बूर थे | 
 
मिली इज़ाज़त लेकिन शर्तों के साथ 

आसान नहीं था नवाब साहब को मना पाना | नवाब साहब के दिल में भी शंका थी कि यदि तिरंगा फहरा गया तो कही ऐसा न हो कि स्वतंत्र भारत का हिस्सा बनने के लिए उन पर दवाब और बढ़ जाए | खासकर आवाम का | खैर  ...स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा रहे दो सक्रिय सेनानी सामने आए | नाम था,रतनलाल गुप्ता और मदनलाल गुप्ता | हिम्मत और पूर्ण विश्वास के साथ नवाब हमीदुल्ला साहब के सामने अपनी मांग रखी | काफी मशक्क्त के बाद झंडा फहराने की अनुमति तो मिली लेकिन शर्तें जोड़ दी गई | वो शर्त थी,प्रिंसली स्टेट के झंडे के साथ ही एक निश्चित समय तक के लिए तिरंगा फहराया जा सकता है | 
 
किस इमारत पर फहराया गया था ..तिरंगा 
 
यूँ तो भोपाल में उस वक्त भी कई बड़ी इमारतें मौजूद थी लेकिन रियासत के आधीन | इन इमारतों पर ध्वज भी था लेकिन प्रिंसली स्टेट का | आज़ादी के दिन जिस इमारत का भाग्य खुला,वो थी जुमेराती स्थित जीपीओ | यानी की जनरल पोस्ट ऑफिस | चंद मिनिट तक इस इमारत को स्वतंत्र होने का सुख हासिल हो सका | 
 
कितने समय तक फहराता रहा तिरंगा 

रियासत ने अनुमति तो दी लेकिन अनमना होकर | लोग खुश थे कि शर्तों के साथ ही सही उनका प्यारा ध्वज लहराने की तमन्ना तो पूरी होगी | शर्त के अनुसार आज़ादी के दिन महज 15 मिनिट तक ध्वज लहराया गया था | 
 
तिरंगे को कब मिला स्थाई आकाश 
नवाब हमीदुल्ला की दिली इच्छा नहीं थी कि भोपाल रियासत का विलीनीकरण हो | नवाब अपनी जिद पर लगातार अड़े रहे | प्रयास भी किए | आखिरकार  भारत का एक अहम हिस्सा बनना पड़ा लेकिन विलीनीकरण के अंतिम चरण में | 1 जून 1949 ,यह वो तारीख थी जब भोपाल रियासत का विलय हुआ और तिरंगे को भोपाल के आसमान में स्थाई जगह मिल ही गई |