मामा ,भैया और पिता | भरोसे पर खरे उतरते शिवराज


Vidisha का बाढ़ वाले हनुमान जी का मंदिर बिल्कुल अलहदा अंदाज में सजा था। मंडप चमचमाहट के साथ फूलों की खुश्बू से आसपास का क्षेत्र महक रहा था । शादी ही थी जिसकी तैयारियां जोरों पर थी

कठिन से कठिन परिस्थितियों का मुस्करा कर सामना करने वाले शिव बाबू थोड़े नर्वस थे । 
चेहरे पर खुशी के भाव के साथ चिंता की लकीरें भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही थी । 
चिंता.. मेहमानों के खातिरदारी ठीक से तो हो रही है । बारातियों के स्वागत में कोई कोताही न हो जाए । व्यवस्थाओं में कमी न रहे । 
चिंता लाज़मी थी...तीन बेटियों विवाह जो था ।
वो बेटियां जो उनके दिल का टुकड़ा थी । बड़े नाज़ो से पाला था । आज वो बाबुल का आंगन छोड़ पिया के घर जो जाने वाली थी । 
बिल्कुल एक आम आदमी की तरह शिवराज सिंह व्यवस्था जमाने मे व्यस्त थे । धर्मपत्नी साधना सिंह रस्म रिवाज निभा रही थी । 
1998 ..यही वो साल था जब शिव बाबू और साधना जी के जीवन में सात दत्तक बेटियों का प्रवेश हुआ । मां के नाम पर शुरू किए गए सुंदर सेवा आश्रम में इन बच्चियों ने अपने बालपन से लेकर ससुराल जाने तक का समय शिव साधना की ममता की छांव में ही व्यतीत किया । 
 । शिव बाबू ने पिता के रुप में अपने हर फ़र्ज़ को निभाया तो माँ के रूप में साधना जी ने दुलार  लुटाने में कोई कोर कसर न छोड़ी । 
वक्त बीता...बिटिया बड़ी हुई । बीते सालो में चार बेटियों की धूमधाम से विवाह किया और आज छोटी तीन बेटियां प्रीति, राधा और सुमन के शादी की घड़ी आ पहुंची ।
शिव बाबू ने दामादों को तलाशने से लेकर विवाह कराने तक की जिमेदारी को बखूबी निभाया ।
जहां आज सगे संबंधों में भी स्वार्थ हावी हो जाता है ऐसे में शिव बाबू की निश्चल प्रेम सभी को छू गया । 
वैसे भी शिवराज स्नेह और सेवा के सागर हैं तभी तो पूरे प्रदेश की महिलाओं के भैया और भांजे भंजियो के मामा हैं