ज़िंदगी कमीन है साहब | कैसे और क्यों ?


 जिंदगी में अक्सर बहुत सारे लोग या फिर ऐसे पल आते हैं ...जो हमको असहज कर जाते हैं । होता है न ऐसा ...। अच्छा सोचिए न ...किसी दिन आप खुश हों...। यानी कि सब कुछ पटरी पर भाग रहा हो । दिमाग के एक कोने में यह अहसास पसरना लगा हो कि जो खराब था...वो ठीक हो गया या फिर उसको दुरूस्त करने का रास्ता मिल गया । आप पूरे उत्साह से काम में जुट जाते हैं । नई नई योजना ...नए नए सपने बुनने में जुट जाते हैं। आपका व्यवहार..आपके बोलने का अंदाज सब कुछ एक दम अलग हो जाता है । खुशमिजाजी आपकी गाढ़े दोस्त की तरह कदमताल करती नुमाया होने लगती है । अहसास होता है कि अब जो होगा बेहतर होगा । आत्मविश्वास कुलांचे मारता हुआ ...चहेरे पर नाचता है । कुल जमा..कोई देखकर समझ सकता है कि बंदा..सेट है। बस यही वो मोड़ होता है जब ज़िंदगी अपना रंग बदलती है । अचानक कुछ ऐसा होता है कि आपके मूड,आपके आत्मविश्वास, आपकी खुशियों में ब्रेक लग जाते हैं । कुछ भी होता है । अचानक कोई ऐसी खबर आती है जो फिर परेशान कर देती है । कुछ नही तो वो समस्या सामने आ जाती है..जो वक्त के साये में कही छुप गयी थी । एक झटका और सबकुछ आपको झिंझोड़ जाता है । परेशानी का जाल फिर से आपको एक अजीब इंसान की परिभाषा में तब्दील कर देता है । यह कमीन ज़िंदगी अपना असल रंग दिखा देती है ..बोले तो फुल कमीनापन । यही वक्त होता है सम्हलने का . सम्हालने का । यहां थमे तो खिसके..। तैयार रहिए...जिंदगी जब कमीनापन दिखाए तो आप उससे भी बड़े कमीने बन जाइये । जैसे को तैसा ...बस चलती रहेगी ज़िंदगी ...अन्यथा कब अटक ले और कब पटक ले ...पता भी न चलेगा