कांग्रेस का रायता

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रायता अभी ठीक से परोसा भी न गया...और उसको फैलाने पर कांग्रेसी आमादा हो गये ।

आशा न थी लेकिन किस्मत ज़ोरदार थी...सो बन गया । बनते ही कांग्रेस के नेताओ को लगने लगा कि रायते में खटास ज्यादा है ।

खैर...मिल कर बनाया गया था तो बांटकर खाने की बात थी ।

सिंधिया और कमल नाथ....दोनो नेता चाहते थे कि यह रायता पहले उनकी कटोरी में आये ।

जद्दोजहद के बाद आखिरकार कमलनाथ जी ने अपने कटोरी पूरी भर ली ।

भरी कटोरी देख सिंधिया बिगड़ गये लेकिन मास्साब ने समझा कर चुप करा दिया ।

महाराजा साहब चुप तो हो गये लेकिन रायता न मिलने का मलाल खूब साल रहा था ।

जैसे तैसे यह मसला निपटा तो महाराजा साहब को भरोसा था कि अगली बैठने वाली पंगत में उनके चेलों को थोड़ा ज्यादा रायता मिल जायेगा ।

लेकिन उफ्फ...यहां भी जिस चमचे से रायता परोसे जाने वाला था..वह सब आधे खाली थे ... ।

घर के साथ पड़ोसी भी बिगड़ पड़े । हाँ में हाँ मिलाने वाले पड़ोसी चीख पड़े "रायता बना है तो सब में बराबर बटेगा ।

जब असंतोष वाले खेमें को लगने लगा कि बाजी हाथ से जा रही है तो.."खायंगे नही तो फैला देंगे की तर्ज़ में तेवर दिखाना शुरू कर दिया है ।

बेचारे कमलबाबू क्या करें ...।

हाड़ तोड़ मेहनत की...समीकरण बैठाये ..किस्मत ने भी आखरी मौका देते हुये सत्ता पकड़ा दी लेकिन ..कांग्रेस की "पैर अडाओ - रायता फैलाओ" संस्कृति ने नींद हराम कर दी । कमलबाबू जानते थे कि ..रायता पहले ही खट्टा था और अब अपने और पराये उसे लुढकाने पर आमादा है ।

वहां शिव भी इसी जुगत में है कि यहां कांग्रेस का रायता फैले और वहां भाजपा अपनी खिचड़ी पका लें ।

खैर सभी की नज़र रायते पर है तो कमल बाबू.. राहुल बाबा को लेकर फैल रहे रायते को समेटने की जुगाड़ में.. बाकी सब मज़े मेँ.….

 

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